कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत जिनमें धुवाँ के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार और जय हो के लिये ऑस्कर शामिल हैं, फिल्म निर्देशक, फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक और कवि पद्मभूषण आदरणीय श्री गुलज़ार किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।
उन्होंने अनगिनत फिल्मों के लिये गीत लिखे है जो हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं। आपने लगभग दो दर्जन फिल्मों का निर्देशन किया है। मेरे अपने, कोशिश, परिचय, मासूम, आँधी आदि सब की सब फिल्में अपनी कलाकृति और विषयवस्तु की गहरी पकड़ के लिये अमर हो गई हैं।
गुलज़ार दीना में जन्मे थे। जो अब पाकिस्तान में है। बँटवारे में उनके परिवार को अपना घर अपना गाँव छोड़ना पड़ा था। सांप्रदायिक हिंसा के उस घिनौने दौर से वे गुज़रे हैं जब फ़िरक़ावाराना वहशत ने इंसानियत के जिस्म में ख़राशें पैदा कीं थी। पर समय के गुज़रने के साथ कुछ बदला नहीं। पुराने ज़ख़्म भरने भी नहीं पाते कि फिर दंगे और फिर ख़राशें।
इस दर्दनाक क़िस्से को गुलज़ार ने बड़ी बेबाकी से हमारे सामने रखा है- ख़राशें में।
गुलज़ार की इन कविताओं और कहानियों में विषम परिस्थितियों में भी इंसानियत का चेहरा चमक कर सामने आया है। कवि हमसे कोंच कोंच कर पूछता है यदि आप ऐसी विकट परिस्थिति में फँसें तो आपकी सोच पर मज़हब का पर्दा होगा या इंसानियत की समझ।
नाटक की भाषा गुलज़ार की है जिसे सुनने के लिये लोग सदा बेताब रहते हैं।
पिछले नाटक कब तक रहें कुँवारे में बहुत हँस लिये थे, अब हँसी रोक कर एक गंभीर विषय पर कुछ देर सोच लें। यों तो वतन की बात टाइमपास करने के लिये की जाती है। बैठकों में ज्ञान प्रदर्शन के लिये की गई बौद्धिक बकवास। पर हम वतन की बात को मंच पर ले आये हैं क्यों कि गुलज़ार कहते हैं |