हुल्लास जैन की कविता

मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
तक़दीर ने दिशाएँ किस्मत की मोड़ी


कलायन का नया नाटक

 
 
 

आज वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति इस तीव्र गति से अग्रसर है कि इसका प्रभाव हमारे सामाजिक जीवन पर पड़ रहा है। यह प्रगति की ही देन है कि परंपराओं की व्याख्याएँ बदल रही है, संबंधों की परिभाषाएँ बदल रही हैं। हमारी मान्यताओं के तार खिंचे चले जा रहे हैं और लक्ष्मण रेखा की परिधि विवादास्पद है। इन्हीं मुद्दों पर मथुरा कलौनी का नाटक स्‍वयंवर 2010 स्‍त्री - पुरुष संबंधों पर उलझे कुछ प्रश्‍नों का उत्तर देने की चेष्‍टा करता है।

 
 

 
बोले तो मुम्बई की घाई में व्यंग्य का झक्कास यज्ञ!

आपको शीर्षक पढ़कर थोड़ी हैरत जरूर हुई होगी, लेकिन अनूठी मुम्बईया हिन्दी में 'खाली-पीली' व्यंग्य लेखन करने वाले श्री यज्ञ शर्मा पर लिखे इसे
लेख के लिए यही मुफीद लगा.
 
 

 
 
'बहाना नहीं, ठोस कारण है। नब्बे किलो तो होगा ही।'
'क्या बक रहे हो?'
'जिसके कारण देर हुई उसका वजन बता रहा था। इधर देखो।'  कह कर उसने कार की पिछली सीट की ओर इशारा किया।...
 
मथुरा कलौनी
का रहस्‍य, रोमांच और हास्‍य से भरपूर उपन्‍यास
 

विषकन्‍या

 

 
 

   

पूर्ण स्वस्थ लोग भी ध्यान दें,की हमारी खान पान की कुछ आदतें गलत हो सकती हैं, और उन्हें बदलने की आवश्यकता है
श्री वी के अग्रवाल, का एक उपयोगी और ज्ञानवर्धक लेख - खान पान की आदतें - अपनी सहायता स्वयं करें

   
 
   
 
   
  अंतिम शरण्य

किस विषम परिस्थिति में डाला विचलित मन काँप-काँप जाता,
कैसी यह आज्ञा सखे, कि जिसको सुन कर ही मन घबराता!
द्रौपदी की द्विविधा को उजागर करती प्रतिभा सक्‍सेना की कविता अंतिम शरण्य

   
 
   
 
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शरीफ बदमाश

हम तुम्हारा भाषण सुनने के लिए यहाँ नहीं आये हैं और न ही विश्वविद्यालय का परिचय-पत्र इस बात का प्रमाण है कि तुम बहुत शरीफ हो।

आजकल विश्वविद्यालय एवं कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र रातों-रात अमीर बनने के लिए बदमाशों की शागिर्दी में जाते हैं और फिर किसी हॉस्टल में दाखिला लेकर अपने को पढ़ाकू छात्र साबित करने की कोशिश करते हैं।

 
 

सब कुछ ठीक ठाक है

एक जमाना था जब हम जवाँ थे, एक जमाना यह है जब कहना पड़ रहा है कि हम अब भी जवाँ हैं। फर्क इतना है कि तब दिल से सोचते थे और अब थोड़ा बहुत दिमाग से भी सोच लेते हैं।

प्यार तब भी अपरिभाषित था और आज भी अपरिभाषित ही है। इसमें दिमागी सोच कम ही काम करती है।

ग़ालिब कह गये हैं -

'यह आग का दरिया है..'

सामरसेट माम कह गये हैं
'प्यार के मामले में तटस्थ मत रहो..'
प्यार के इस पहलू पर लिखी गई यह कहानी काल्पनिक हैं पर कपोल काल्पनिक नहीं।

-मथुरा कलौनी

  शुभ दीपावली
दीप जलाने हों तो, मन के दीप जलाओ
नफरत का तिमिर हटा, चेहरों पर मुसकान लाओ


 
 
जरा सा घी दे दे माई
'कौन है इहाँ दूध का धुला ,
बड़े ऊँचे -ऊँचन ने छला।!
कलपती हुइ है मातु कृपी!'
'जरा सा घी दे दे माई।'

पढि़ये महाभारत के महारथी अश्वत्थामा पर प्रतिभा सक्सेना की कविता 'जरा सा घी दे दे माई
'

 
ख़राशें - बेंगलोर में मंचन

तीन हाउसफुल प्रदर्शन और टिकटों के लिये मारा-मारी


 
 
Images of 'Kharaashein'
 

 
जूता संस्कृति - बहस

पाराशर गौर


 
गुरु बिनु कौन बताए बाट

गुरु माहात्‍म्‍य पर डॉ अरविन्द पारशर का लेख


 
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