कलायन नाट्य संस्था की प्रस्तुति,एक शाम प्रेमचंद के नाम

एक शाम प्रेमचंद के नाम, उनके जीवन की कुछ झलकियों के साथ उनकी कुछ कालजयी कहानियों का नाट्यरूपांतरण है। नाटक की परिकल्पना और निर्देशन मथुरा कलौनी का है।

नाटक के मंचन संबंधित जानकारी के लिए इस लाइन में क्लिक करें।


कायापलट

जब ध्रुव का बिछड़ा दोस्त महेश उससे मिलने आता है तो उसे क्या मालूम था कि उसके साथ कुछ ऐसा घटेगा जिसकी कल्पना वह इस जन्म में तो क्या किसी जन्म में भी नहीं कर सकता था। वह अपने को एक ऐसे नये परिवेश में पाता है जहाँ उसे अपने ही घर के बारे में कुछ मालूम नहीं रहता है। आप मिलेंगे जनार्दन से जिसने जीवन का निचोड़ बोतल में खोज निकला है, जुल्फी से जो नौकर कम शायर ज्यादा है, पड़ोस की छम्मक छल्लो मल्लिका से... रुकिए रुकिए... यहाँ एक चोर भी है। और इन सब के बीच में है चंद्रा। “लोग गायब हो जाते हैं, गुम हो जाते हैं, पर यह पहली बार है कि आदमी चोरी हो गया है।“ हँसी ठहाकों से भरपूर नाटक जिसके पात्र पाठकों को बहुत दिनों तक गुदगुदाते रहेंगे।


तू नहीं और सही

जो रिश्ता दो साल के लंबे समय तक चले वह केवल एक अरेजमेंट बन कर नहीं रह जाता। उससे आगे भी  कुछ होने का दावा करता है| ़पढि़ये मथुरा कलौनी का बहुचर्चित लघुनाटक तू नहीं और सही। ( इस नाटक को नवें अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन बीजिंग चीन में नाट्य पाठ के लिये आमंत्रित किया गया था)


एक व्यंग्य रचना

सुजाता शुक्ला के पॉंच दोहे


चमनलाल की मौत
चमनलाल कोई भी हो सकता है, आदमी भी हो सकता है और औरत भी। विजय कुमार की कलम से एक मार्मिक कहानी।
पढि़ए विजय कुमार की एक दिलचस्प कहानी 'चमनलाल की मौत'


आँगन की चिडि़या
वह तो आँगन की चिड़िया थी, जो अपना आँगन छोड़ उड़ चुकी है। अब तो उसे सिर्फ मेहमान बनकर आना है। चार दिन हँस खेलकर फिर वापस लौट जाना है।...
पढि़ए राजुल आशोक की एक दिलचस्प कहानी ' आँगन की चिड़या '


 
सभी जानते हैं उसके संबंध में लेकिन कोई भी उसका नाम अपनी जुबान पर नहीं लाता। नाम उच्चारण करने में बहुत अश्लील लगता है। पढि़ए मथुरा कलौनी की एक दिलचस् प कहानी ' उसके बारे में'


   
कहते हैं युवावस्था में मन मचल जाता है, दृष्टि फिसल जाती है इत्यादि। रूमानी साहित्य में कालेज-जीवन में ऐसी घटनाओं के होने का वर्णन मिलता है। मेरा छात्र-जीवन अतीत के गर्त में कहीं है तो सही पर उसका वर्णन यहाँ पर विषयांतर होगा। संप्रति नैनीताल में मेरे पास इन सब बातों के लिये समय ही नहीं है।
अपने बारे में कभी कभी-कभार सोच लेता हूँ बस। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है मानो मैंने लड़कपन से सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर लिया हो, बीच के युवावस्था वाले भाग को लाँघ कर।
क्या इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है।
पढि़ए मथुरा कलौनी की एक दिलचस् प कहानी
 

   
सुमति बिफर गई। उसने मेरी बात पूरी नहीं होने दी। 'उस तरह मुस्कराने के लिए मैं चार दिनों से अभ्यास कर रही थी शशि। मेरा भी आत्मसम्मान हो सकता है यह तुम्हें ध्यान नहीं आया।'
पढि़येमथुरा कलौनी की एक मर्मस् पर्शी कहानी।
   
 

 
भारतीय युवा - जलवायु परिवर्तन

श्री वी. के. अग्रवाल का लेख
 

 
हुल्लास जैन की कविता

मैंने मन्दिर की राह जबसे छोड़ी
तक़दीर ने दिशाएँ किस्मत की मोड़ी


 

 
बोले तो मुम्बई की घाई में व्यंग्य का झक्कास यज्ञ!

आपको शीर्षक पढ़कर थोड़ी हैरत जरूर हुई होगी, लेकिन अनूठी मुम्बईया हिन्दी में 'खाली-पीली' व्यंग्य लेखन करने वाले श्री यज्ञ शर्मा पर लिखे इसे
लेख के लिए यही मुफीद लगा.

 
 

 
   

पूर्ण स्वस्थ लोग भी ध्यान दें,की हमारी खान पान की कुछ आदतें गलत हो सकती हैं, और उन्हें बदलने की आवश्यकता है
श्री वी के अग्रवाल, का एक उपयोगी और ज्ञानवर्धक लेख
- खान पान की आदतें - अपनी सहायता स्वयं करें

   
 
   
 
   
  अंतिम शरण्य

किस विषम परिस्थिति में डाला विचलित मन काँप-काँप जाता,
कैसी यह आज्ञा सखे, कि जिसको सुन कर ही मन घबराता!
द्रौपदी की द्विविधा को उजागर करती प्रतिभा सक्सेना की कविता अंतिम शरण्य

   
 
   
 
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शरीफ बदमाश

हम तुम्हारा भाषण सुनने के लिए यहाँ नहीं आये हैं और न ही विश्वविद्यालय का परिचय-पत्र इस बात का प्रमाण है कि तुम बहुत शरीफ हो।

आजकल विश्वविद्यालय एवं कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र रातों-रात अमीर बनने के लिए बदमाशों की शागिर्दी में जाते हैं और फिर किसी हॉस्टल में दाखिला लेकर अपने को पढ़ाकू छात्र साबित करने की कोशिश करते हैं।

 
 

सब कुछ ठीक ठाक है

एक जमाना था जब हम जवाँ थे, एक जमाना यह है जब कहना पड़ रहा है कि हम अब भी जवाँ हैं। फर्क इतना है कि तब दिल से सोचते थे और अब थोड़ा बहुत दिमाग से भी सोच लेते हैं।

प्यार तब भी अपरिभाषित था और आज भी अपरिभाषित ही है। इसमें दिमागी सोच कम ही काम करती है।

ग़ालिब कह गये हैं -

'यह आग का दरिया है..'

सामरसेट माम कह गये हैं
'प्यार के मामले में तटस्थ मत रहो..'
प्यार के इस पहलू पर लिखी गई यह कहानी काल्पनिक हैं पर कपोल काल्पनिक नहीं।

-मथुरा कलौनी

  शुभ दीपावली
दीप जलाने हों तो, मन के दीप जलाओ
नफरत का तिमिर हटा, चेहरों पर मुसकान लाओ


 
 
जरा सा घी दे दे माई
'कौन है इहाँ दूध का धुला ,
बड़े ऊँचे -ऊँचन ने छला।!
कलपती हुइ है मातु कृपी!'
'जरा सा घी दे दे माई।'

पढि़ये महाभारत के महारथी अश्वत्थामा पर प्रतिभा सक्सेना की कविता 'जरा सा घी दे दे माई
'

 
ख़राशें - बेंगलोर में मंचन

तीन हाउसफुल प्रदर्शन और टिकटों के लिये मारा-मारी


 
 
Images of 'Kharaashein'
 

 
जूता संस्कृति - बहस

पाराशर गौर


 
गुरु बिनु कौन बताए बाट

गुरु माहात्म्य पर डॉ अरविन्द पारशर का लेख


 
 
 
 
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