जूता संस्कृति - बहस
पाराशर गौर

 
 
 

जूता संस्कृति -  बहस


जूते चप्पलों में
हो गई बहस
छिड़ गई लड़ाई
लगे करने दोनों
अपनी अपनी बढ़ाई !

चप्पल बोली ........
यद्यपि, देखने में हम
कोमल, नाजुक, कमजोर हैं
ध्यान रहे ...
हमारे किस्से जगत मशहूर हैं !

आम आदमी से लेकर
मंत्री संत्री, नेता हमें
अपने साथ रखने पर
मजबूर हैं ! नेता जी!  नेता जी तो हमें
बड़े प्यार से दुलारते हैं, पुचकारते हैं
और बड़े सम्‍मान के साथ
हमें पार्लियामेंट तक ले जाते हैं
ऐसा नहीं ........
हम भी आड़े वक़्त उनके काम आती हैं !

टेलीविजन , अखबारों में
आये दिन हमारी तस्बीरें छपती हैं
जब जब हम
पार्लियामेन्ट में एक दूसरे पर बरसती हैं !

वह जूते से बोली ..
है तुम्हरा, ऐसा कोई किस्सा ?
जो, संसद में लिया हो तुमने
कभी हिस्सा !


जूता बोला ...
बस ... तुम में यही तो कमी है
बात को पेट में पचा नहीं पाती हो
यूँही खामखॉं ,,,
चपड़ चपड़ करती रहती हो !

सुनो
चाहे हम रबड़ के हों
या हो, चाँदी के
सारे मुरीद हैं हमारे
यहॉं से वहॉं तक के !

जब जब मै चलता हूँ
या चलूँगा .....
अच्‍छे अच्‍छे के मुँह
बंद हो जायेंगे
इसीलिए तो सब कहते हैं
यार, चॉंदी का मारो तो
सब काम हो जायेंगे !

पटवारी से लेकर
व्‍यापारी तक,
सिपाही से लेकर
मंत्री तक
सब हमारे कर्जदार हैं
तभी तो, लोग कहते हैं
जूता ... बड़ा दमदार है
रही हिस्से किस्से की बात
तमाशा देख लेना 
आज के बाद संसद में
तुम नहीं , हम ही हम चलेंगे !

ये किस्सा
तो अपने देश में द्खोगी ही
संसार में भी नाम कमाउँगा
देख लेना
दुनिया के अखबारों के
फ्रंट पेज पर अपनी तस्स्बीर छपाउँगा !

देखा नहीं , इराक में क्या हुआ
बुश पर कौन चला? .... मैं
चिदम्बर, अडवानी और अब
मनमोहन पर भी कौन चला? .... मैं